हर बस्ती-बस्ती में जल रहे घर हैं

हर बस्ती-बस्ती में जल रहे घर हैं
हर तरफ आतिशे नफरत के मंजर हैं

सपनों के महलों में रहते थे कल तक
आज हर वो शख़्स सपनों से बेघर हैं

थक के बैठ जाते है चन्द कदम चल के,
राहे-मंज़िल में ऐसे राही मिले अक्सर हैं

फूलों सा सहेज रखा था अब तलक़ जिसे,
मिला आज उसकी नज़ाकत में ख़ंजर हैं

पंछियों की बस्तियाँ भी अब उजड़ गई हैं,
आज हर घूँट ज़हर के पीते शजर हैं

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