माँ

कुर्सी पर बैठी मानवी परेशान चित्त सी अपने से ही बुड़बुड़ा रही थी। सास होती तो मैं समझ सकती कि उसे मेरी क्या परवाह है मगर माँ कब से ऐसी हो गई? माँ तो हमेशा ही मेरी छोटी से छोटी बात का ध्यान रखती रही है। आज माँ को हुआ क्या जो सुबह-सुबह घर से चली गई?

रसोईघर से भी आज सुबह-सुबह खटर-पटर की आवाज़ आ रही थी। मैं जागी-सोई सी अवस्था में सोच रही थी कि माँ आज इतनी सुबह क्या कर रही है। फिर सोचा शायद मंदिर जाने का मन कर आया हो क्योंकि पिछले कई हफ्तों से बीमार जो चल रही थी, मन भी तो उकता जाता है घर पड़े-पड़े। बस सोचते-सोचते फिर मेरी आँख लग गई।

तन्वी की तकलीफ़ की वज़ह से सो कहाँ पाई थी मैं रातभर। सुबह मेरी आँख खुलने में देर हो गई। उठते ही घर में देखा तो माँ थी नहीं सोचा अभी आती होगी मंदिर से। इंतज़ार करते-करते दोपहर हो गई माँ तो अभी लौटी ही नहीं। झुंझलाहट के साथ-साथ फिक्र भी होने लगी, माँ गई तो गई कहाँ। इतनी देर लगा दी, बैठ गई होगी किसी से बातें करने। क्या उसे नहीं पता पिछली तीन रातों से मैं तन्वी की तकलीफ़ की वज़ह से ठीक से सो नहीं पा रही। पूरे बदन पे लाल चकत्तों ने परेशान कर रखा है बच्ची को। कोई दवा भी तो असर नहीं कर रही। अच्छी आई भारत, आते ही गर्मी ने धर दबोचा। चार दिन ही हुए मुश्किल से आए और घेर लिया तकलीफ ने।

जब से माँ की बीमारी का सुना था बड़ा बेचैन था मन मिलने को। दिन-रात सोचती रहती थी कितनी बँधी हूँ यहाँ, अपनी नौकरी और घर की ज़िम्मेदारियों में। माँ अकेली कैसे अपना ध्यान रख पाती होगी बीमारी में। कैनेडा की जगह यदि पास के शहर में ब्याही होती मैं तो ज़रूरत पड़ने पर देख-भाल तो कर पाती। मृदुल को भी अमरीका ब्याह दिया। क्या पता था माँ को कि दोनों बेटियों को विदेश ब्याह कर जल्दी ही इतनी अकेली हो जाएगी। दो बरस पहले ही पापा का देहान्त अचानक दिल के दौरे से हो गया। जब से पापा नहीं रहे माँ ने जैसे दिल ही छोड़ दिया है और तबीयत भी ढीली ही रहने लगी है। आसान भी कहाँ होती है पिछली उम्र अकेले गुज़ारना?

मैं भी क्या करती समय से देख-भाल करने कैसे आती? स्कूल की नौकरी है ही ऐसी – छुट्टियाँ भी तो जून में ही होती हैं। माँ से मिलने की तड़प ने कुछ सोचने ना दिया और छुट्टियाँ होते ही मैं तन्वी को लेकर कुछ दिनों के लिए भारत आ गई। ऐसा नहीं कि तन्वी पहले भारत आई ही नहीं, तीन बरस की थी जब पापा का देहान्त हुआ। सर्दी का मौसम था तो सब ठीक ही रहा था। तन्वी उस रोज़ दोपहर को आँगन में ना निकलती तो यह हालत ना होती। आँगन में माँ ने एक छोटा सा बगीचा लगा रखा है। रंग-बिरंगे फूलों पर उड़ती तितली को देखने के मोह ने तन्वी को धूप का एहसास ना होने दिया। उसे ख़ुश देखकर मैं भी ख़ुश थी, इस ओर ध्यान ही ना गया कि तन्वी पर ज़रा देर की धूप इस तरह से हावी हो जाएगी। बस उसी दिन से उसके बदन पर लाल चकत्ते हो गए, खुजली से परेशान ना वह रातभर सो पाती है ना मैं।

मन ही मन मानवी खीझ रही थी यदि माँ घर रहती तो तन्वी के पास बैठ जाती और मैं ज़रा सोकर सर का भारीपन तो कम कर लेती – पर कहाँ।

इतने में ही घर का ताला खुलने की आवाज़ आई तो वह भाग कर दरवाज़े की ओर पहुँची देखा तो माँ आ गई। खीझी तो पड़ी ही थी आते ही माँ पर बिगड़ने लगी कहाँ चली गईं थी तुम सुबह से ना कुछ कहा ना बताया। तुम्हें नहीं लगा कि मैं कितनी परेशान हो जाऊँगी। तुमने तो इतना भी ना सोचा कि ज़रा तन्वी का ख्याल ही रख लूँ ताकि मानवी कुछ देर आराम करले। मानवी गुस्से में बोलती चली जा रही थी।

थकी-मांदी माँ ने सहजता से कहा, “बेटा ज़रा भीतर तो आ जाने दे ज़रा साँस ले लूँ फिर जो चाहे कह लेना।”

मानवी को अपनी गल्ती का एहसास हुआ तो बोली, “हाँ-हाँ आओ अंदर,” और जाकर पानी का गिलास भी ले आई। माँ को पानी का गिलास थमा फिर से शिकायत का पुलंदा खोल बैठी। माँ सब सुनती रही और चुप-चाप थैले से साबुन की टिकियाँ और मरहम की डिबिया निकाल कर मानवी की और बढ़ा कर बोली-

“बेटा फूल सी तन्वी का दु:ख मुझ से देखा नहीं जा रहा था इसलिए सुबह-सुबह शहर वाले हकीम के पास दवा लेने चली गई थी। जब तू और मृदल छोटी थी तो तेरी नानी इसी हकीम की देसी दवा ही दिया करती थी। बहुत पुराना जाना-माना हकीम है। मैं तो सालों से कभी उस ओर गई ही नहीं। अब तो दिल्ली का नक्शा ही बदल गया है कहीं मैट्रो चलने लगी है तो कहीं पुल बन गए हैं। बसों के आने-जाने के ठिकाने भी बदल गए हैं, बस लोगों से पूछ-पाछ के किसी तरह हकीम की दुकान पर पहुँच ही गई। इन्हीं चक्करों में थोड़ी देर हो गई आने में। और यदि तुझे बता कर जाती तो क्या तू जाने देती मुझे? नहीं ना, बस इसीलिए तो नहीं बताया था तुझे।”

मानवी और भी गुस्सा गई – “क्यों गईं तुम? तुम्हें अपनी हालत का अंदाज़ा है कुछ? अभी-अभी तो बीमारी से उठी हो यदि तुम्हें इस गर्मी में कुछ हो जाता तो?”

“अरे तू मेरी चिन्ता छोड़ तन्वी से अधिक ज़रूरी तो नहीं मेरी सेहत।”

यह सब सुन मानवी की आवाज़ रुँध गई बोली, “माँ, हमें तुम्हारी कितनी ज़रूरत है तुम समझती क्यों नहीं हो।”

“अच्छा छोड़ सब यह बता तूने और तन्वी ने कुछ खाया? मैं सुबह तुम दोनों के लिए खाना बना के गई थी। मुझे तेरी परेशानी और थकान का एहसास है मानवी।”

“नहीं माँ मैं रसोई की ओर तो गई ही नहीं, तन्वी ने कुछ बिस्कुट खा लिए थे और उसे कुछ खाने की इच्छा नहीं थी और मैं तो गुस्से से ही भुनभुनाती रही मुझे क्या मालूम था कि तुम हमारे लिए इतना सोचती हो। किसी तरह तन्वी ठीक हो जाए उसके लिए तुम गर्मी की परवाह किए बिना कमज़ोरी की हालत में बसों के धक्के खाती इतनी दूर दवाई लेने चलीं गईं और मैंने तुम्हारे लिए ज़रा सी देर में क्या-क्या सोच लिया।”

मानवी की रुँधी आवाज़ आँसुओं में ढल गई। ज़मीन पर बैठ माँ के घुटनों पर सर रख मानवी अविरल आँसू बहाती रही।

“माँ मुझे माफ कर दो मैनें अपने स्वार्थवश पता नहीं तुम्हारे लिए क्या सोच लिया। माँ मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई।”

माँ बिना कुछ बोले मानवी की पीठ सहलाती रही।

“एक बार कह दो माँ कि तुमने मुझे माफ किया वरना कैसे जी पाऊँगी मैं,” और लगातार सुबकती रही।

माँ ने प्यार से माथा चूम सर पर हाथ रख सीने से लगा लिया। मानवी फिर से जी उठी। माँ को कस के बाहों में भींच के बोली, “माँ… माँ ऐसी क्यों होती है?”

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गुलाब का फूल

English: Rashtrapati Bhawan illuminated on 26-...

English: Rashtrapati Bhawan illuminated on 26-29 Jan, every year on occasion of Indian Republic Day Anniversary. हिन्दी: राष्ट्रपति भवन, को प्रतिवर्ष २१६-२९ जनवरी तक गणतंत्र दिवस की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में प्रकाशित किया जाता है। (Photo credit: Wikipedia)

छोटी सी मिनी बिटिया स्कूल से दौड़ती घर पहुँची तो सीधे नानी के पास गई और बोली, “नानी, देखो मैं दौड़ में पहला नंबर आयी हूँ। मुझे ये कप मिला है।”

नानी ने अपना चश्मा लगाया और कप अपने हाथ में लेकर देखा और बोली, “शाबाश बिटिया, ये तो बहुत प्यारा कप है।

अच्छा बताओ, इस बात पर तुम्हें मेरे पास से क्या मिलेगा?”

“एक रुपया,” मिनी ने खुशी से उचकते हुए कहा।

“कैसे जाना कि मैं तुम्हें एक रुपया दूँगी,” नानी ने प्रश्न किया।

“वाह, नानी भूल गये। इसके पहले जब भी मैं परीक्षा में पहला नंबर आयी आपने मुझे एक रुपया ही तो दिया था,” मिनी बोली।

“तो उन रुपयों का तुमने क्या किया?” नानी पूछा।

“वो सारे मैंने गुल्लक में डाल दिये,” मिनी ने जवाब दिया।

“देखो, अब जो मैं तुमको रुपया दूँ तो उसे गुल्लक में मत डालना। उसे जो तुम्हारे मन में भाये उसमें खर्च करना। ठीक है।” यह कह नानी ने मिनी को एक रुपया दिया और कहा, “जा, इससे कुछ खरीद ले।”

बाज़ार मिनी के घर के पास था। मिनी रुपया लेकर बाज़ार तरफ दौड़ पड़ी। वहाँ उसने सड़क पर खूब भीड़ देखी। सड़क पर वर्दी पहने सैनिक धुन बजाते मार्च कर रहे थे और सड़क के दोनों ओर लोग कतारबद्ध खड़े थे। मिनी ने देखा कि भीड़ में प्रायः सभी लोगों के हाथ में पुष्पगुच्छ थे। उसने सोचा कि शायद सड़क पर से किसी परी की सवारी जा रही होगी और उसको फूल भेंट करने लोग जमा हैं। फिर उसने सोचा कि हो सकता है कि कोई राजकुमार जिसकी कहानी नानी बताती थी वही जा रहा हो। इस तरह के अनेक विचार उसके मन में उठे। वह वहाँ से दौड़ पड़ी और फूलवाले के पास के पास जाकर उसने नानी का दिया रुपया दिखाकर कहा, “क्या वह उसे एक रुपये में फूल का गुच्छा दे सकेगा?”

फूलवाले ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, इस एक रुपये में तो मैं एक गुलाब का फूल ही दे सकूँगा।”
मिनी ने कहा, “ठीक है,” और वह एक गुलाब का फूल लेकर भीड़ की तरफ दौड़ी। परन्तु भीड़ में उसे अंदर जाने नहीं मिल रहा था। तभी एक जवान सैनिक की नज़र उस पर पड़ी। वह दूसरी तरफ से भीड़ चीरता मिनी के पास आया और मिनी को गोद में उठाकर अपने साथ ले वहाँ ले चला जहाँ सैनिकों मार्च करते बढ़ रहे थे और उनके पीछे एक फूलों से ढकी तोपगाड़ी जा रही थी। वह सैनिक उसे तोपगाड़ी के पास ले गया। अचानक बैंड की धुन बंद हो गई और मार्च करते सैनिक रुक गये। जवान ने गोदी से उतारकर मिनी को तोपगाड़ी के पायदान पर खड़ा कर दिया। मिनी ने तुरंत उस तोपगाड़ी के फूलों के ढ़ेर पर अपना गुलाब का फूल रख दिया। सब सैनिकों ने मिनी को सलाम किया और उनकी देखा-सीखी में मिनी ने भी तोपगाड़ी के पायदान पर ही खड़े रहकर अपना नन्हा-सा हाथ उठाकर सलाम किया। तभी बैंड की धुन पुनः बज उठी।

जवान ने आगे बढ़कर मिनी को फिर से गोदी पर उठा लिया और सड़क किनारे उतार दिया। मिनी ने देखा कि जवान की आँखें गीली हो उठीं थी। मिनी ने अपनी नन्ही-सी हथेली से उस जवान के आँसू पोंछे। पास खड़ी भीड़ के लोगों में से किसी ने मिनी की पीठ थपथपाई तो किसी ने उसे गोदी में उठाकर उसके गालों पर चुम्मी दी। मिनी खुशी से दौड़ती अपने घर तरफ जाने लगी। तभी फूल की दुकानवाले ने उसे बुलाया और कहा, “बिटिया रानी! तूने तो मेरे दिये फूल की बहुत शान बढ़ाई है। यह अपना दिया रुपया वापस ले।”

मिनी ने घर आकर नानी को सारी किस्सा बताई, तो नानी ने कहा, “मिनी बिटिया, जानती है तूने क्या किया? तूने वह गुलाब का फूल एक शहीद को भेंट किया है। मेरे दिये एक रुपये का तूने सम्मान किया है। मैं इस बात पर तुम्हें एक रुपया और देती हूँ।”

तब मिनी ने अपने नन्ही-सी हथेली खोलकर नानी को बताया, “नानी, वो फूलवाले ने भी मुझे बुलाकर मेरा रुपया वापस दिया और कहा कि मैंने उसके दिये फूल की शान बढ़ाई है, इसलिये वह रुपया वापस दे रहा है। मैंने वह रुपया ले लिया। ठीक किया ना, नानी।”

“मेरी प्यारी बच्ची,” नानी ने मिनी को गोदी में उठाकर कहा, “तू पैसे का अच्छा उपयोग करना जानती है, इसलिये ही फूलवाले ने तुझे वह रुपया वापस किया है।”

હું ને ચંદુ

હું ને ચંદુ છાનામાના કાતરીયામાં પેઠા
લેસન પડતું મુકી ફિલમ ફિલમ રમવા બેઠા
મમ્મી પાસે દોરી માંગી પપ્પાની લઇ લુંગી
પડદો બાંધી અમે બનાવી ફિલમ એની મુંગી
દાદાજીના ચશ્મામાંથી કાઢી લીધા કાચ
એનાથી ચાંદરડા પાડ્યા પડદા ઉપર પાંચ
ચંદુ ફિલમ પાડે ત્યારે જોવા આવું હું
હું ફિલમ પાડુ ત્યારે જોવા આવે છે ચંદુ
કાતરીયામાં છુપાઇને બેઠી તી બિલ્લી એક
ઉંદરડીને ભાળી એણે તરત લગાવી ઠેક
ઉંદરડી છટકી ને બિલ્લી ચંદુ ઉપર આવી
બિક લાગતા ચંદુડીયાએ બુમાબુમ ચગાવી
ઓ મા… ઓ મા……
દોડમ દોડ ઉપર આવી પહોચ્યા મમ્મી પપ્પા
ચંદુડીયાનો કાન આમળ્યો, મને લગાવ્યા ધબ્બા

બા, મને ચપટી વગાડતાં આવડી ગઈ

બા, મને ચપટી વગાડતાં આવડી ગઈ

બા, મને ચપટી વગાડતાં આવડી ગઈ.
મારી ચપટી વાગે છે પટ પટ પટ,

જાણે ફૂટે બંદૂકડી ફટ ફટ ફટ,

પેલી બિલ્લી ભાગે છે ઝટ ઝટ ઝટ.

બા, મને બિલ્લી ભગાડતાં આવડી ગઈ.
તું કપડાં ધુએ ભલે ધબ્બ ધબ્બ ધબ્બ,

હું પાણીમાં નહીં કરું છબ્બ છબ્બ છબ્બ,

મારી ચપટી ભીંજાઈ જાય ડબ્બ ડબ્બ ડબ્બ.

બા, મને મુન્ની રમાડતાં આવડી ગઈ.
બા, મને ચપટી વગાડતાં આવડી ગઈ.