रिश्तों से अब डर लगता है

रिश्तों से अब डर लगता है।
टूटे पुल-सा घर लगता है।

चहरों पे शातिर मुस्कानें
हाथों में ख़ंजर लगता है।

संग हवा के उड़ने वाला
मेरा टूटा पर लगता है।

हथियारों की इस नगरी में
जिस्म लहू से तर लगता है।

जीवन के झोंकों पर तेरा
साथ हमें पल भर लगता है।

सारा जग सिमटा घर में तो
घर जग के बाहर लगता है।

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हवाओं में ऐसी ख़ुशबू पहले कभी न थी

हवाओं में ऐसी ख़ुशबू पहले कभी न थी
ये चाल बहकी बहकी पहले कभी न थी

ज़ुल्फ़ ने खुलके उसका चेहरा छुपा लिया
घटा आसमा पे ऐसी पहले कभी न थी

आँखें तरस रहीं हैं दीदार को उनके
दिल में तो ऐसी बेबसी पहले कभी न थी

फूलों पे रख दिए हैं शबनम ने कैसे मोती
फूलों पे ऐसी रौनक पहले कभी न थी

यादों की दस्तकों ने दरे दिल को खटखटाया
आती थी याद पहले पर ऐसी कभी न थी

ये किस कुसूर की सज़ा मुझे दी है तुमने

ये किस कुसूर की सज़ा मुझे दी है तुमने
मेरी आँखों में इक नदी छुपा दी है तुमने

हवा चले न चले हरदम दहकती रहती है
मेरे दिल में ये कैसी आग लगा दी है तुमने

आँखें झरती हैं तुम्हें याद करने से पहले
मेरे दिल में ये कैसी चाह जगा दी है तुमने

मौत के नाम से ही डर लगा करता था
मुझे हर साँस में मरने की सज़ा दी है तुमने

ऐसे तुम मुझको बेरुख़ी से सताया न करो

ऐसे तुम मुझको बेरुख़ी से सताया न करो
बेवफ़ा कहके मुझे ऐसे रुलाया न करो

जब से बिछडे हो अश्क़ गिराती हैं मेरी आँखें
बर्बाद करके मुझको मुस्कुराया न करो

काँटों भरी हैं राहें और गहरी तन्हाई है
हँस हँस के मेरे को और बढ़या न करो

ज़िन्दगी की राह में कुछ और भी ग़म हैं
इक ख़ुशी थी प्यार की उसको घटाया न करो

नाम लिख कर मेरा किसी ख़त में अपने
बेदर्दी से तुम उसको मिटाया न करो